Pandit Lekh Ram : लेखनी और शास्त्रार्थ ही पण्डित लेखराम को सच्ची श्रद्धांजलि- मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ

 Pandit Lekh Ram का 125 वां बलिदान  दिवस मनाया गया


Pandit Lekh Ram : लेखनी और शास्त्रार्थ ही पण्डित लेखराम को सच्ची श्रद्धांजलि- मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ

श्रीराम सेन सिलवानी

Maharshi Dayanand Saraswati Yoga Sansthan आर्य समाज महरौनी के तत्वाधान में आर्य मुसाफिर शास्त्रार्थ महारथी Pandit Lekh Ram का 125 वां बलिदान दिवस  मनाया गया।


महरौनी(ललितपुर)-- maharshi dayanand saraswati yoga sansthan आर्य समाज महरौनी के तत्वाधान में आर्य मुसाफिर शास्त्रार्थ महारथी Pandit Lekh Ram का 125 वां बलिदान दिवस   मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ के पुरोहित्य व शिक्षक रामसेवक निरंजन की अधयक्षता व सुधीर त्रिपाठी पंडा प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट सदस्य किशोर न्याय बोर्ड  के मुख्य आतिथ्य व आर्य रत्न शिक्षक लखनलाल आर्य के संचालन में मनाया गया।

मुनि परुषोत्तम वानप्रस्थ ने कहा कि पण्डित लेखराम  आर्य समाज के प्रमुख कार्यकर्ता एवं प्रचारक थे। उन्होने अपना सारा जीवन आर्य समाज के प्रचार प्रसार में लगा दिया। वे अहमदिया मुस्लिम समुदाय के नेता मिर्जा गुलाम अहमद से शास्त्रार्थ एवं उसके दुस्प्रचारों के खण्डन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उनका संदेश था कि तहरीर (लेखन) और तकरीर (शास्त्रार्थ) का काम बंद नहीं होना चाहिए। पंडित लेखराम इतिहास की उन महान हस्तियों में शामिल हैं जिन्होंने धर्म की बलिवेदी पर प्राण न्योछावर कर दिए। जीवन के अंतिम क्षण तक आप वैदिक धर्म की रक्षा में लगे रहे। पंडित लेखराम ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए हिंदुओं को धर्म परिवर्तन से रोका व शुद्धि अभियान के प्रणेता बने।


अध्यक्षता करते हुए रामसेवक निरंजन शिक्षक ने कहा कि लेखराम का जन्म 8 चैत्र, संवत् १९१५ (१८५८ ई.) को झेलम जिला के तहसील चकवाल के सैदपुर गाँव (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पूर्वज महाराजा रणजीत सिंह की फौज में थें। उनके पिता का नाम तारा सिंह एवं माता का नाम भाग भरी था।

सत्रह वर्ष की उम्र में वे सन् १८७५ ईसवी में पेशावर पुलिस में भरती हुए और उन्नति करके सारजेंट बन गए। इन दिनों इनपर 'गीता' का बड़ा प्रभाव था। दयानंद सरस्वती से प्रभावित होकर उन्होंने संवत् १९३७ विक्रमी में पेशावर में आर्यसमाज की स्थापना की। १७ मई सन् १८८० को उन्होंने अजमेर में स्वामी जी से भेंट की। शंकासमाधान के परिणामस्वरूप वे उनके अनन्य भक्त बन गए।


मुख्य अतिथि सुधीर त्रिपाठी पंडा सदस्य प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट किशोर न्याय बोर्ड  ने कहा कि लेखराम जी ने सन् १८८४ में पुलिस की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। अब उनका सारा समय वैदिक धर्मप्रचार में लगने लगा। कादियाँ के अहमदियों ने हिंदू धर्म के विरुद्ध कई पुस्तकें लिखी थीं। लेखराम जी ने उनका जोरदार खंडन किया।


संचालन करते हुए आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य ने कहा कि स्वामी दयानंद का जीवन चरित्र  लिखने के उद्देश्य से उनके जीवन संबंधी घटनाएँ इकट्ठी करने के सिलसिले में उन्हें भारत के बहुसंख्यक स्थानों का दौरा करना पड़ा। इस कारण उनका नाम 'आर्य मुसाफिर' पड़ गया। पं॰ लेखराम हिंदुओं को विधर्मी  होने से बचाते थे। एक विधर्मी ने 6 मार्च सन् १८९७ को  'शुद्धि' कराने के बहाने, धोखे से लाहौर में उनकी हत्या कर दी।

पण्डित लेखराम की अंतिम इच्छा थी कि " धर्म के मग में अधर्मी से कभी डरना नही,चेतकर चलना कुमारग में कदम धरना नहीं"।।



बलिदान दिवस में धनीराम निरंजन बकील साहब सिमिरिया,महेश पटैरिया, जय देवी शुक्ला,सुमन लता सेन,रागनी दुबे, अदिति सेन आर्या,सोम प्रकाश दुबे, वेद प्रकाश दुबे, आदित्य शुक्ला,वेदी शुक्ला,वेदिका शुक्ला आदि आर्य जन उपस्थित रहें।

संचालन आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य एवं आभार रवि प्रकाश दुबे ने जताया।

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